शून्य का साम्राज्य: खोई यादों की तलाश (The Kingdom of Zero: Quest for Lost Memories)
कहानी: पत्थर का दर्पण (The Stone Mirror)
हिमालय की बर्फीली चोटियों के नीचे बसा 'नीलगिरी' गाँव अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए प्रसिद्ध था, लेकिन वहाँ की एक प्राचीन गुफा के बारे में फैली कहानियाँ लोगों के मन में भय पैदा करती थीं। गाँव के बुजुर्गों का कहना था कि उस गुफा के अंत में
एक 'पत्थर का दर्पण' है, जो किसी भी व्यक्ति के बाहरी रूप को नहीं, बल्कि उसकी आत्मा के असली रंग को दिखाता है।
गाँव का जमींदार विक्रम एक बेहद प्रभावशाली लेकिन क्रूर व्यक्ति था। उसके पास धन की कमी नहीं थी, लेकिन उसका दिल पत्थर
जैसा कठोर था। उसने अपनी शक्ति के बल पर कई गरीबों की जमीनें हड़प ली थीं। जब उसने इस जादुई दर्पण के बारे में सुना, तो उसने इसे ढोंग करार दिया। उसने अपनी मूछों पर ताव देते हुए कहा, "मैं उस गुफा में जाऊँगा और साबित करूँगा कि यह
सब मनगढ़ंत बातें हैं। मेरा व्यक्तित्व इतना भव्य है कि वह पत्थर भी मेरी चमक से चकाचौंध हो जाएगा।"
अगली सुबह, विक्रम हाथ में मशाल लेकर अकेले ही उस अंधेरी गुफा की ओर चल पड़ा। जैसे-जैसे वह गुफा के भीतर जा रहा था, हवा ठंडी और भारी होती जा रही थी। अंत में, उसे एक विशाल, काला और अत्यंत चिकना पत्थर दिखाई दिया। यह वही
'पत्थर का दर्पण' था।
विक्रम ने बड़े गर्व से उस दर्पण के सामने खड़े होकर अपनी मशाल ऊपर की। उसे लगा था कि उसे अपना शानदार चेहरा और सोने के आभूषण दिखाई देंगे। लेकिन जैसे ही उसकी नज़र दर्पण पर पड़ी, उसके पैर कांपने लगे और मशाल उसके हाथ से छूट गई।
दर्पण में विक्रम का चेहरा नहीं, बल्कि एक डरावनी और बदसूरत आकृति दिख रही थी। उसकी आँखें लाल थीं और उसके शरीर पर उन हजारों लोगों की आहें और आँसू चिपके हुए थे, जिन्हें उसने सताया था। उसे अपनी परछाईं में वे बेघर बच्चे और लाचार किसान दिखे जिनकी जमीनें उसने छीन ली थीं। वह दृश्य इतना भयानक था कि विक्रम अपनी ही रूह को देखकर घृणा से भर गया।
वह डर के मारे पागलों की तरह गुफा से बाहर भागा। वह कई दिनों तक अपने कमरे में बंद रहा। उसे बार-बार वही बदसूरत चेहरा याद आता। उसे समझ आ गया कि वह दुनिया की नज़रों में अमीर हो सकता है, लेकिन उस दिव्य दर्पण की नज़र में वह एक अपराधी था।
धीरे-धीरे विक्रम के भीतर एक बदलाव आने लगा। उसने उन सभी किसानों को बुलाकर उनकी जमीनें वापस कर दीं। उसने गाँव में
एक बड़ा विद्यालय और औषधालय बनवाया। उसने अपना शेष जीवन लोगों की सेवा में समर्पित कर दिया।
एक साल बाद, वह फिर से उसी गुफा में गया। इस बार उसके मन में कोई अहंकार नहीं था। जब उसने दर्पण में देखा, तो उसे
एक शांत और प्रकाशमय चेहरा दिखाई दिया। पत्थर के दर्पण ने उसे डराया नहीं था, बल्कि उसे जीवन का सबसे बड़ा सत्य
सिखाया था—कि हमारे कर्म ही हमारी असली पहचान हैं।

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