वैकल्पिक शीर्षक: जादुई पुस्तकालय का रहस्य, कोरी किताब की पुकार, या सुकून की तलाश।
कहानी: अदृश्य धागे
शहर की भागदौड़ से दूर, एक शांत पहाड़ी पर एक छोटा सा पुश्तैनी पुस्तकालय था। वहाँ की देखरेख ८० साल के दादाजी, पंडित दीनदयाल करते थे। उस पुस्तकालय में एक ऐसी अलमारी थी जिसे कभी कोई नहीं खोलता था। कहा जाता था कि उसमें "भविष्य की कहानियाँ" रखी हैं।
एक दिन, शहर का एक सफल लेकिन बहुत ही तनावग्रस्त बिजनेसमैन, समीर, रास्ता भटककर वहाँ पहुँचा। उसके पास सब कुछ था—पैसा, शोहरत, और गाड़ियाँ—पर उसके पास शांति नहीं थी।
समीर ने चिढ़ते हुए पूछा, "बाबा, इस पुरानी जगह पर धूल फांकने के अलावा आप करते क्या हैं?"
दीनदयाल जी मुस्कुराए और उसे उस पुरानी अलमारी के पास ले गए। उन्होंने एक कोरी किताब निकाली और समीर के हाथ में रख दी। समीर ने पन्ने पलटे, "यह तो खाली है!"
पंडित जी ने कहा, "बेटा, यह तुम्हारी कहानी है। अभी तक तुमने वही लिखा है जो दुनिया देखना चाहती थी—पैसा और रसूख। अब आँखें बंद करो और वो लिखो जो तुम्हारा दिल चाहता है।"
समीर ने मज़ाक में आँखें बंद कीं और अचानक उसे अपनी माँ की याद आई, जिसकी बरसी पर वह काम के चक्कर में नहीं जा पाया था। उसे अपना बचपन याद आया जब वह कागज़ की नावें बनाता था। जैसे ही उसने कलम पकड़ी, किताब के पन्नों पर सुनहरे अक्षर उभरने लगे।
किताब में लिखा था: "सफलता वह नहीं जो बैंक बैलेंस बताए, सफलता वह है जो रात को चैन की नींद दे।"
समीर की आँखों में आँसू आ गए। उसे समझ आया कि वह एक ऐसी दौड़ दौड़ रहा था जिसका कोई अंत नहीं था। उसने उसी वक्त तय किया कि वह अपने गाँव वापस जाएगा और उन बच्चों के लिए स्कूल खोलेगा जिन्हें उसकी ज़रूरत है।
जैसे ही उसने यह फैसला लिया, पुस्तकालय की खिड़की से एक ठंडी हवा आई और वह कोरी किताब अब खुशियों की कहानियों से भर गई थी। समीर अब अकेला नहीं था; वह उन 'अदृश्य धागों' से जुड़ गया था जो इंसान को इंसानियत से जोड़ते हैं।

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