नीलकंठ का समर्पण: कृष्ण के मोर पंख की अनकही गाथा

वृंदावन की पावन भूमि पर जब सूर्य की पहली किरण यमुना के शीतल जल को स्पर्श करती, तो चराचर जगत जाग उठता था। कदम्ब के वृक्षों की सघन छाया में, जहाँ गोपियों की पायल की झंकार और गायों के रंभाने की गूँज सुनाई देती थी, वहीं एक कोने में 'नील' रहता था। नील एक मोर था, किंतु नियति ने उसे अन्य मोरों जैसा वैभव नहीं दिया था। जहाँ वृंदावन के अन्य मोरों के पंख पन्ने की तरह हरे और नीलम की तरह नीले चमकते थे, वहीं नील के पंख मटमैले और रंगहीन थे। वह जब अपने पंख फैलाता, तो उनमें वह इंद्रधनुषी चमक नहीं होती थी जिसे देखकर संसार मुग्ध हो जाए। वन के अन्य अभिमानी मोर अक्सर उसका उपहास करते थे। "नील, तू व्यर्थ ही इस पावन भूमि पर विचरण करता है," वन का सबसे सुंदर मोर, 'मयूरराज', अट्टहास करते हुए कहता। "देख मेरे पंखों को, जब मैं नाचता हूँ तो स्वयं वनदेवी ठिठक जाती हैं। और तू? तू तो केवल धूल का एक कण मात्र है।" नील कुछ नहीं कहता। उसकी मटमैली आँखों में एक अजीब सी गहराई थी। वह अपमान के कड़वे घूँट पीकर चुपचाप यमुना के तट पर बैठा रहता। उसे अपनी कुरूपता का दुख नहीं था, उसे दुख था तो बस इस बात का कि वह अपने आराध्य, उस साँवरे सलोने कृष्ण के सामने नृत्य करने योग्य नहीं था। वह सोचता, "हे गोविंद! क्या मेरी भक्ति भी मेरे पंखों की तरह बेरंग है? क्या मुझे कभी आपके दर्शन का सौभाग्य प्राप्त होगा?" अध्याय २: मुरली की तान (The Sound of the Flute) एक दोपहर, जब ग्रीष्म की तपिश अपने चरम पर थी, नील प्यास से व्याकुल होकर एक घनी झाड़ी के पीछे सुस्ता रहा था। तभी, अचानक हवा में एक ऐसी मिठास घुली कि सारा वन जैसे मौन हो गया। वह मुरली की तान थी। ऐसी धुन, जो सीधे आत्मा के तारों को झंकृत कर दे। नील अपनी प्यास भूल गया। वह सम्मोहित होकर उस दिशा की ओर बढ़ने लगा जहाँ से संगीत आ रहा था। पत्थरों के पीछे छिपते-छिपते वह उस स्थान पर पहुँचा जहाँ एक विशाल वटवृक्ष की जड़ों पर पैर पर पैर धरे, त्रिभंगी मुद्रा में 'वो' विराजमान थे। श्याम वर्ण, पीतांबर धारी, और अधरों पर वो जादुई बाँसुरी। नील के प्राण जैसे उनकी आँखों में अटक गए। कृष्ण की आँखें बंद थीं, जैसे वे संगीत के माध्यम से पूरे ब्रह्मांड से बात कर रहे हों। नील ने देखा कि वृंदावन के सभी सुंदर मोर वहाँ एकत्रित थे। वे अपने पंख फैलाकर कृष्ण के चारों ओर नृत्य कर रहे थे। मयूरराज सबसे आगे था, अपनी सुंदरता का प्रदर्शन कर रहा था। नील को अचानक अपनी कुरूपता का बोध हुआ। उसने खुद को पत्तों के पीछे और गहरा छिपा लिया। उसे डर था कि कहीं उसकी बदसूरती उस दिव्य दृश्य को अपवित्र न कर दे। तभी संगीत रुका। कृष्ण ने अपनी आँखें खोलीं। उनकी दृष्टि सीधे उस झाड़ी की ओर गई जहाँ नील छिपा था। कृष्ण मुस्कुराए—एक ऐसी मुस्कान जिसमें पूरे संसार का प्रेम समाया था।

टिप्पणियाँ

बच्चों के लिए शिक्षा वाली हिंदी कहानियां

एकता में बल: संगठन की शक्ति

वैकल्पिक शीर्षक: जादुई घड़ी का रहस्य, रुका हुआ वक्त, या कल की खोज।

वैकल्पिक शीर्षक: जादुई पुस्तकालय का रहस्य, कोरी किताब की पुकार, या सुकून की तलाश।