माँ की ममता – अनमोल प्यार की कहानी

शीर्षक: माँ की ममता गाँव के किनारे एक छोटा-सा घर था, जहाँ सावित्री देवी अपने इकलौते बेटे अर्जुन के साथ रहती थीं। मिट्टी का वह घर भले ही साधारण था, लेकिन उसमें माँ की ममता की खुशबू हमेशा बसी रहती थी। सावित्री देवी का जीवन अपने बेटे के इर्द-गिर्द ही घूमता था। अर्जुन ही उनकी दुनिया था, उनकी खुशी था, उनका सपना था। अर्जुन जब छोटा था, तब से ही सावित्री देवी ने उसे बहुत प्यार से पाला। उसके पिता का देहांत बहुत पहले हो चुका था, इसलिए माँ ने ही पिता और माँ दोनों का फर्ज निभाया। खेतों में काम करके, दूसरों के घरों में काम करके उन्होंने अर्जुन को कभी किसी चीज़ की कमी महसूस नहीं होने दी। सुबह सूरज उगने से पहले ही सावित्री देवी उठ जातीं। चूल्हे पर रोटी बनातीं, अर्जुन के लिए दूध गर्म करतीं और फिर उसे प्यार से जगातीं— “उठ जा बेटा, स्कूल जाना है।” अर्जुन कभी-कभी आलस करता, लेकिन माँ की ममता भरी आवाज़ सुनकर उठ जाता। माँ उसके बाल सँवारती, उसे तैयार करती और अपने हाथों से खाना खिलाकर स्कूल भेजती। समय के साथ अर्जुन बड़ा होने लगा। वह पढ़ाई में बहुत तेज़ था और गाँव के स्कूल में हमेशा अच्छे अंक लाता। सावित्री देवी को अपने बेटे पर बहुत गर्व था। वह हर किसी से कहतीं— “मेरा बेटा एक दिन बड़ा आदमी बनेगा।” गाँव के लोग भी अर्जुन की तारीफ करते और सावित्री देवी की मेहनत की सराहना करते। लेकिन इस खुशी के पीछे सावित्री देवी की बहुत मेहनत और त्याग छिपा था। कई बार ऐसा होता कि घर में खाने के लिए पर्याप्त अनाज नहीं होता, लेकिन वह अपने हिस्से का खाना भी अर्जुन को खिला देतीं और खुद भूखी रह जातीं। एक रात अर्जुन ने देखा कि माँ ने खाना नहीं खाया। उसने पूछा— “माँ, आप खाना क्यों नहीं खा रही?” सावित्री देवी मुस्कुराते हुए बोलीं— “बेटा, मुझे भूख नहीं है, तू खा ले।” अर्जुन छोटा था, वह समझ नहीं पाया, लेकिन माँ की आँखों में छिपा दर्द साफ झलक रहा था। समय बीतता गया। अर्जुन ने दसवीं और बारहवीं की परीक्षा अच्छे अंकों से पास की। अब वह आगे की पढ़ाई के लिए शहर जाना चाहता था। लेकिन इसके लिए पैसे की जरूरत थी। सावित्री देवी के पास ज्यादा पैसे नहीं थे। उन्होंने अपने गहने बेच दिए, कुछ उधार लिया और अर्जुन को शहर भेज दिया। शहर की जिंदगी अर्जुन के लिए नई थी। वहाँ की चमक-दमक, बड़े-बड़े कॉलेज, नई दोस्ती—सब कुछ अलग था। धीरे-धीरे वह शहर की जिंदगी में खो गया। शुरू-शुरू में वह रोज माँ को फोन करता, लेकिन फिर हफ्ते में एक बार और धीरे-धीरे महीने में एक बार बात होने लगी। उधर गाँव में सावित्री देवी हर दिन बेटे का इंतज़ार करतीं। हर बार जब फोन की घंटी बजती, तो उनका दिल धड़क उठता कि शायद अर्जुन का फोन होगा। वह हर त्योहार पर उसके लिए नए कपड़े बनवातीं, लेकिन अर्जुन कभी-कभी ही घर आ पाता था। एक दिन सावित्री देवी बीमार पड़ गईं। उन्हें तेज बुखार था, लेकिन उन्होंने अर्जुन को कुछ नहीं बताया। वह नहीं चाहती थीं कि उसका पढ़ाई में ध्यान भटके। पड़ोस की औरतें उनकी मदद करतीं, लेकिन माँ का दिल तो बेटे के लिए ही तड़पता था। उधर अर्जुन अपनी पढ़ाई और दोस्तों में इतना व्यस्त था कि उसे माँ की हालत का पता ही नहीं चला। कुछ दिनों बाद जब हालत ज्यादा बिगड़ गई, तो पड़ोसी ने अर्जुन को फोन किया। यह सुनते ही अर्जुन के पैरों तले जमीन खिसक गई। वह तुरंत गाँव के लिए निकल पड़ा। जब वह घर पहुँचा, तो उसने देखा कि माँ बिस्तर पर लेटी हुई हैं, बहुत कमजोर हो गई हैं। उनकी आँखों में अब भी वही प्यार था, लेकिन शरीर थक चुका था। अर्जुन उनकी हालत देखकर रो पड़ा। उसने माँ का हाथ पकड़कर कहा— “माँ, मुझे माफ कर दो। मैं आपको छोड़कर शहर चला गया और आपकी हालत भी नहीं जान पाया।” सावित्री देवी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा— “बेटा, माँ कभी अपने बच्चों से नाराज नहीं होती। तू खुश रह, यही मेरे लिए सबसे बड़ी खुशी है।” उनकी यह बात सुनकर अर्जुन का दिल भर आया। उस दिन अर्जुन ने महसूस किया कि माँ की ममता कितनी गहरी होती है। वह बिना कुछ कहे सब कुछ सह लेती हैं, सिर्फ अपने बच्चों की खुशी के लिए। अर्जुन ने तय किया कि अब वह अपनी माँ को कभी अकेला नहीं छोड़ेगा। उसने शहर की नौकरी छोड़ दी और गाँव में ही कुछ काम शुरू किया। धीरे-धीरे माँ की तबीयत ठीक होने लगी। अर्जुन अब हर समय उनके साथ रहता, उनका ख्याल रखता। एक दिन शाम को जब दोनों आँगन में बैठे थे, तो सावित्री देवी ने कहा— “बेटा, मुझे तुझ पर गर्व है।” अर्जुन ने माँ के पैर छूते हुए कहा— “माँ, अगर आप नहीं होतीं, तो मैं कुछ भी नहीं होता।” सावित्री देवी की आँखों में आँसू आ गए, लेकिन यह आँसू खुशी के थे। उस दिन अर्जुन को समझ आ गया कि दुनिया में माँ की ममता से बढ़कर कुछ भी नहीं है। यह वह ताकत है जो हर मुश्किल को आसान बना देती है, हर दर्द को सहने की शक्ति देती है। समय बीतता गया, लेकिन अर्जुन अब कभी माँ से दूर नहीं हुआ। उसने अपने जीवन का सबसे बड़ा सच जान लिया था— माँ का प्यार ही जीवन का सबसे बड़ा सहारा है। सीख: माँ की ममता निस्वार्थ होती है। वह बिना किसी उम्मीद के अपने बच्चों के लिए सब कुछ करती है। हमें चाहिए कि हम उनकी कद्र करें और उन्हें कभी अकेला महसूस न होने दें।

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