: महिषासुर मर्दिनी: शक्ति के अवतार माँ दुर्गा की विजय गाथा
माँ दुर्गा और महिषासुर का युद्ध (The Story of Maa Durga)
1. महिषासुर का वरदान और अहंकार
प्राचीन काल में महिषासुर नाम का एक शक्तिशाली राक्षस था। उसने भगवान ब्रह्मा की घोर तपस्या की। जब ब्रह्मा जी प्रकट हुए, तो उसने अमर होने का वरदान माँगा। ब्रह्मा जी ने कहा, "जो जन्मा है उसकी मृत्यु निश्चित है।" तब चतुर महिषासुर ने वरदान माँगा कि "मेरी मृत्यु न तो किसी देवता के हाथों हो, न मनुष्य और न ही किसी पशु के हाथों। केवल एक स्त्री ही मेरा वध कर सके।" उसे लगा कि एक अबला नारी उसका क्या बिगाड़ पाएगी।
2. देवताओं का संकट
वरदान पाते ही महिषासुर अहंकारी हो गया। उसने पाताल और पृथ्वी को जीतने के बाद स्वर्ग पर आक्रमण कर दिया। इंद्रदेव और अन्य देवता उससे हार गए। सभी देवता त्रिमूर्ति (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) के पास मदद के लिए पहुँचे।
3. माँ दुर्गा का प्राकट्य
देवताओं की पुकार सुनकर भगवान विष्णु, शिव और ब्रह्मा के मुख से एक दिव्य तेज प्रकट हुआ। सभी देवताओं की शक्ति उस तेज में समाहित हो गई और उसी पुंज से माँ दुर्गा का प्राकट्य हुआ।
भगवान शिव ने उन्हें अपना त्रिशूल दिया।
विष्णु जी ने अपना चक्र दिया।
इंद्र ने अपना वज्र और हिमालय ने सवारी के लिए शक्तिशाली सिंह (शेर) प्रदान किया।
4. भयंकर युद्ध
माँ दुर्गा ने अपनी गर्जना से तीनों लोकों को गुंजायमान कर दिया। महिषासुर ने अपनी विशाल सेना माँ के सामने खड़ी कर दी। नौ दिनों तक भयंकर युद्ध चला। महिषासुर ने अपनी माया से कभी भैंसा, कभी हाथी और कभी शेर का रूप लिया। अंत में, जब वह फिर से भैंसे का रूप धरकर माँ पर हमला करने आया, तब माँ दुर्गा ने अपने त्रिशूल से उसके हृदय पर प्रहार किया और उसका वध कर दिया।
5. बुराई पर अच्छाई की जीत
महिषासुर के वध के बाद देवताओं ने स्वर्ग से फूलों की वर्षा की और माँ की स्तुति की। इसी कारण माँ दुर्गा को 'महिषासुर मर्दिनी' कहा जाता है। यह जीत हमें याद दिलाती है कि बुराई चाहे कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो, सत्य और धर्म के सामने उसे झुकना ही पड़ता है।

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